Saturday, February 25, 2006

वाणी की दीनता

वाणी की दीनता
अपनी मैं चीन्हता !

कहने में अर्थ नहीं
कहना पर व्यर्थ नहीं
मिलती है कहने में
एक तल्लीनता !

आस पास भूलता हूँ
जग भर में झूलता हूँ
सिंधु के किनारे जैसे
कंकर शिशु बीनता !

कंकर निराले नीले
लाल सतरंगी पीले
शिशु की सजावट अपनी
शिशु की प्रवीनता !

भीतर की आहट भर
सजती है सजावट पर
नित्य नया कंकर क्रम
क्रम की नवीनता !

कंकर को चुनने में
वाणी को बुनने में
कोई महत्व नहीं
कोई नहीं हीनता !

केवल स्वभाव है
चुनने का चाव है
जीने की क्षमता है
मरने की क्षीणता !
*****
-भवानीप्रसाद मिश्र
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